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मुखाग्नि-Contest

Posted On: 27 Mar, 2017 में

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मुखाग्नि

मेरी प्रिय सहेली नीरा केंसर के रोग से पीड़ित थी | उसे अपनी मृत्यु से अधिक यह चिंता  थी कि उसका अंतिम संस्कार कौन करेगा |

एक दिन वह कहने लगी , “मैं  तो दो दो बेटियों की माँ हूँ  | बेटा तो मेरे भाग्य में ही नहीं है | उनके पिता भी बीमार  हैं | अब अंत समय में न जाने क्या होगा |”

अपनी माँ के मुंह से ऐसी बात  सुन कर बेटी शालिनी की आँखों से दो आंसू टपक पड़े थे  | वह बोली , “माँ ऐसे मत कहो  | आप को कुछ नहीं होगा | मैं हूँ न |”

नीरा का हर संभव इलाज किया जा रहा था | परन्तु केंसर पूरी तरह फ़ैल गया था | डॉक्टर ने भी जवाब देते हुए कह दिया था ,

“अब चाहें कीमो कराओ या गंगा जल पिलाओ कोई फर्क नहीं है |”

दुःख और पीड़ा ने जैसे उस घर में अपना डेरा दाल दिया था , पर वह  समय भी अचानक एक दिन समाप्त हो गया | हमेशा मुस्कराने वाली नीरा दो बड़ी बड़ी हिचकियां लेकर हमेशा के लिए परमात्मा में विलीन हो गयी |

असीम दुःख  का वातावरण घर में छ गया था | बेटियों के आंसू  थम नहीं रहे थे | जब अंतिम संस्कार की बात हुई तो बड़ी बेटी शालिनी ने बड़े दृढ़ता से कहा , “माँ का अंतिम संस्कार मैं करूंगी |”

मैंने देखा, उसके इस प्रस्ताव से वहां एकत्रित लोगों में कानाफ़ूसी शुरू हो गयी | सभी लोग दबी आवाज में इसका विरोध कर रहे थे | दादी ने कहा ,

“अरी शालिनी , बेटा बन के पैदा होती ,तब तो तू अंतिम संस्कार कर पाती | पर तेरी  माँ ने तो बेटियाँ ही जनीं |”

दादी की बात सुनकर शालिनी का क्रोध उसके मुख पर साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा था | उसी समय पंडित जी ने कहा , “शास्त्रों के अनुसार तो पुत्र  ही माता-पिता को मुखाग्नि दे सकता है | वही तर्पण कर सकता है | बेटियों के लिए तो यह निषिद्ध है |” उन्होंने शालिनी की इच्छा पर प्रतिबन्ध लगा दिया था | शालिनी बोली , “जो अधिकार बेटे का  है. वह बेटियों का क्यों नहीं ?”

तभी एक पढ़े लिखे सज्जन आये और कहने लगे , “बेटा जिद मत करो , यह काम लड़कों का ही है | तुम अंतिम समय का वह दृश्य नहीं देख पाओगी |”

शालिनी ने दृढ़ स्वर में कहा , “दादी तो पुराने ज़माने की हैं पर अंकल आप भी | आप तो प्रोफ़ेसर हैं  | यह मेरी माँ हैं , मैं ही उनका अंतिम संस्कार करूंगी |”

सभी ने शालिनी की दृढ़ इच्छा शक्ति को समझा और मूक सहमति दी |

शालिनी ने सभी विधि विधानों एवं औपचारिकताओं को  बड़े आदर से संपन्न किया | अपनी माँ को मुखाग्नि देकर उसके मुख पर अभूतपूर्व  संतोष था | मुझे ऐसी अनुभूति हुई  जैसे  नीरा की आत्मा को भी परम शांति मिल गयी हो | इस सारे प्रकरण में मैं यही सोचती रही कि हम नारियों को कब समाज में समान दर्जा मिलेगा|”


सुनीता माहेश्वरी




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